उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में स्थित भीतरगांव का मंदिर भारतीय इतिहास और वास्तुकला की एक ऐसी धरोहर है, जिसे 'ईंटों से लिखी गई कविता' कहा जा सकता है। यह मंदिर न केवल अपनी प्राचीनता के लिए, बल्कि अपनी बेमिसाल इंजीनियरिंग के लिए भी विश्वभर में प्रसिद्ध है।
भारतीय वास्तुकला का गुप्तकालीन गौरव:-
कानपुर नगर की घाटमपुर तहसील में स्थित भीतरगांव का मंदिर प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला का शिखर माना जाता है। यह 5वीं शताब्दी (गुप्त काल) के दौरान निर्मित हुआ था। गुप्त काल को भारतीय इतिहास का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है, और यह मंदिर उस काल की समृद्ध शिल्पकला का सबसे जीवंत प्रमाण है।
ऐतिहासिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि:-
भौगोलिक रूप से यह मंदिर गंगा-यमुना के मैदानी भाग (दोआब) में स्थित है। उस समय इस क्षेत्र में पत्थरों की कमी थी, इसलिए गुप्तकालीन शिल्पकारों ने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध मिट्टी का उपयोग कर पकी हुई ईंटों और टेराकोटा को निर्माण का माध्यम बनाया। पत्थर के मंदिरों के उस दौर में, पूरी तरह ईंटों से इतना विशाल और ऊंचा मंदिर बनाना उस समय की एक क्रांतिकारी सोच थी।
वास्तुकला की वैज्ञानिक विशेषताएँ:-
भीतरगांव का मंदिर भारतीय मंदिर निर्माण की 'नागर शैली' का प्रारंभिक स्वरूप है। इसकी कुछ प्रमुख वैज्ञानिक और वास्तुशिल्प विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
🚩 शिखर की शुरुआत: यह भारत का सबसे प्राचीन मंदिर है जहाँ ऊंचा शिखर (Pyramidal Roof) देखने को मिलता है। इससे पहले के अधिकांश मंदिर समतल छत वाले होते थे।
🚩 मेहराब तकनीक (Arch Technology): मंदिर के भीतर 'अर्ध-वृत्ताकार मेहराबों' का प्रयोग किया गया है। यह प्राचीन भारत के सिविल इंजीनियरिंग कौशल को दर्शाता है, जो उस समय दुनिया के बहुत कम हिस्सों में विकसित थी।
🚩 मजबूत नींव और ढांचा: बिना किसी आधुनिक मशीनरी के, केवल ईंटों और मिट्टी के गारे से बना यह 70 फीट ऊंचा ढांचा पिछले 1500 वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं को झेलते हुए खड़ा है।
कलात्मक भव्यता: टेराकोटा नक्काशी:-
इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर पकी हुई मिट्टी (टेराकोटा) की बनी शानदार मूर्तियाँ और पैनल लगे हैं। ये मूर्तियाँ न केवल कलात्मक हैं, बल्कि उस समय के सामाजिक और धार्मिक जीवन की झलक भी दिखाती हैं:
🚩 धार्मिक चित्रण: यहाँ भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों (विशेषकर वराह), भगवान शिव, पार्वती, और गणेश की सुंदर आकृतियाँ उकेरी गई हैं।
🚩 पौराणिक कथाएँ: दीवारों पर रामायण और महाभारत के प्रसंगों के साथ-साथ जलीय जीवों, गरुड़ और पुष्पों की बारीक नक्काशी की गई है।
सांस्कृतिक महत्व:-
भीतरगांव का मंदिर हमें याद दिलाता है कि भारत में विज्ञान और कला का समन्वय सदियों पुराना है। यद्यपि आज इसके गर्भगृह में कोई मूर्ति स्थापित नहीं है, लेकिन इसका पूरा ढांचा ही एक तीर्थ के समान है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित यह स्थल आज भी इतिहासकारों और वास्तुकारों के लिए शोध का विषय है।
यह मंदिर उन लोगों के लिए एक प्रत्यक्ष प्रमाण है जो भारत की प्राचीन तकनीकी और कलात्मक क्षमता पर संदेह करते हैं। अपनी जड़ों के इस स्वाभिमान को सहेजना और इसके बारे में जानना हर भारतीय का कर्तव्य है।
वर्तमान संरक्षण और स्थिति:-
आज भीतरगांव का यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के सीधे संरक्षण में है। समय की मार और मौसम के प्रभाव से बचाने के लिए समय-समय पर इसकी मरम्मत की जाती है। चूंकि यह मंदिर ईंटों का बना है, इसलिए नमी और वनस्पति से इसे बचाना एक बड़ी चुनौती रही है। एएसआई ने इसके चारों ओर एक सुंदर बगीचा और घेराबंदी विकसित की है ताकि इसकी ऐतिहासिक गरिमा बनी रहे। यह स्थल अब एक पर्यटन और शैक्षिक केंद्र के रूप में उभरा है, जहाँ दुनिया भर के वास्तुकला के छात्र और इतिहासकार प्राचीन इंजीनियरिंग सीखने आते हैं।
मंदिर की वर्तमान स्थिति:-
गर्भगृह के अंदर अब कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है, लेकिन इसकी आंतरिक शांति और दीवारों की विशालता आज भी एक आध्यात्मिक ऊर्जा का अहसास कराती है। बाहरी दीवारों पर जो टेराकोटा की मूर्तियाँ शेष बची हैं, वे अपनी बारीक कारीगरी के कारण अद्भुत लगती हैं। मंदिर के ऊपर का कुछ हिस्सा समय के साथ क्षतिग्रस्त हुआ था, जिसे एएसआई ने संरक्षित किया है।
कैसे पहुँचें: यात्रा मार्ग की जानकारी:-
भीतरगांव मंदिर कानपुर नगर से लगभग 35 से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ पहुँचने के लिए निम्नलिखित विकल्प उपलब्ध हैं:
सड़क मार्ग द्वारा:-
कानपुर से: आप कानपुर शहर से घाटमपुर मार्ग (हमीरपुर रोड) पर टैक्सी या निजी वाहन से जा सकते हैं। रमईपुर से होते हुए भीतरगांव के लिए रास्ता कटता है।
स्थानीय परिवहन: घाटमपुर से भी भीतरगांव के लिए टेंपो और बसें आसानी से मिल जाती हैं।
रेल मार्ग द्वारा:-
सबसे नजदीकी बड़ा रेलवे स्टेशन कानपुर सेंट्रल है, जो देश के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा है। वहां से आप टैक्सी लेकर करीब 1 घंटे में मंदिर पहुँच सकते हैं।
वायु मार्ग द्वारा:-
निकटतम हवाई अड्डा कानपुर हवाई अड्डा (चकेरी) है। यदि आप अन्य राज्यों से आ रहे हैं, तो लखनऊ स्थित अमौसी हवाई अड्डा (चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट) से भी सड़क मार्ग द्वारा 3-4 घंटे में यहाँ पहुँचा जा सकता है।
सुझाव: यदि आप यहाँ घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे उत्तम है क्योंकि मौसम सुहावना रहता है। साथ ही, इसी यात्रा में आप यहाँ से कुछ ही दूरी पर स्थित बेहटा बुजुर्ग के जगन्नाथ मंदिर (मानसून मंदिर) के दर्शन भी कर सकते हैं।
Journalist Prakash Veer Arya
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